श्वसन (Respiration)

  • श्वसन (Respiration): सजीवों के शरीर में होने वाले समस्त जैविक क्रियाओं के संचालन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है यह ऊर्जा उसे खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है, जिसे श्वसन कहते हैं।
  • श्वसन एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है
  • श्वसन की प्रक्रिया ऊष्माक्षेपी है
  • श्वसन क्रिया में रासायनिक ऊर्जा ATP (Adenosine triphosphate) के रूप में संचित रहती है
  • श्वसन की क्रिया अपचयी या कैटाबॉलिक प्रकार की होती है अर्थात इसमें भोजन का ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में टूटकर ऊर्जा मुक्त की जाती है।
  • श्वसन के क्रियाधार (Respiratory Substrates):- श्वसन अभिक्रिया में भाग लेने वाले उच्च उर्जा युक्त पदार्थ जो ऑक्सीकृत होकर ऊर्जा मुक्त करते हैं श्वसन की क्रियाधार कहलाते हैं। जैसे कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन >
  • शरीर को ऊर्जा सर्वप्रथम कार्बोहाइड्रेट देते हैं उसके पश्चात वसा एवं सबसे अंत में प्रोटीन ।
    कार्बोहाइड्रेट या वसा यदि क्रियाधार हो तो ऐसा श्वसन प्लावी श्वसन एवं यदि क्रियाधार प्रोटीन (भुखमरी एवं रोगों के समय) हो तो एसा श्वसन जीवद्रव्यी श्वसन कहलाता है।

श्वसन के प्रकार (Type of Respiration):-

श्वसन के दो प्रकार है-
(1) बाह्य श्वसन (External Respiration) प्राणियों की कोशिकाओं द्वारा पर्यावरण से ऑक्सीजन अंदर ग्रहण करने एवं CO, को बाहर निकालने से संबंधित प्रक्रियाएं बाह्य श्वसन कहलाती है। इसमें पर्यावरण एवं कोशिकाओं के मध्य 0: एवं CO: का विनिमय होता है इसे सांस लेना (Breathing) या संवातन (Ventilation) भी कहते हैं।
यह एक भौतिक प्रक्रिया है।

(2 ) आंतरिक या कोशिकीय श्वसन (Internal or Cellular Respiration) प्राणियों द्वारा ऑक्सीजन के उपयोग तथा CO: एवं ATP के उत्पादन से सम्बन्धित प्रक्रियाएं आंतरिक या कोशिकीय श्वसन कहलाती है।
यह एक रासायनिक प्रक्रिया है।
ऑक्सीजन की उपस्थिति में

(वायवीय श्वसन)
Glucose (C&HO6) + Oxygen (60:)→ Carbon dioxide(6CO:) + Water(6H₂O) + Energy (ATP)

> ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में (अवायवीय श्वसन ) Glucose (C6H12O6) – Alcohol 2(C2H5OH) + Carbon dioxide 2(CO:) + Energy (ATP)
> अनाक्सी श्वसन को अंतरअणुक श्वसन (Intramoleculer Respiration) भी कहते है

मानव श्वसन तंत्र (Respiratory System of Human)
मानव में गैसीय आदान प्रदान के लिए सुविकसित श्वसन-अंग एवं श्वसन तंत्र पाया जाता हैं। बाह्य नासा छिद्र या नासा द्वार, नासा गुहा, नासा यसनी गुहा, कंठ, श्वासनली, श्वसनी एवं फेफड़ों द्वारा मिलकर श्वसन तंत्र का निर्माण करते हैं।
मानव में फेफड़े मुख्य – श्वसन-अंग है, शेष संरचनाऐं श्वसन मार्ग बनाती हैं।
फेफड़ों में उपस्थित वायुकूपिकाएं श्वसन सतह का कार्य करती हैं।

मानव श्वसन तंत्र को तीन भागो में विभक्त किया गया है-
उपरी श्वसन तंत्र – नासिका, मुख, यसनी, लेरिंग्स
निचला श्वसन तंत्र – श्वासनली, श्वसनी, फेंफडे
श्वसन मांसपेशियां – डायफ्राम, अंतरापर्शुकपेशियां

1. नासिका (Nose): मानव में एक जोड़ी नासा द्वार श्वसन तंत्र के बाह्य छिद्र होते हैं। नासाद्वार द्वारा वायु, नासा गुहा (Nasal cavity) में जाती है।
नासा द्वारों में उपस्थित रोम तथा श्लेष्मा झिल्ली द्वारा ढकी सर्पिल अस्थियों के द्वारा भीतर जाने वाली वायु को छाना जाता है। नासा गुहा में वायु गर्म और नम होती है। वायु में उपस्थित सूक्ष्म कण श्लेष्मा के द्वारा रोक लिये जाते हैं। और फेफड़ों में जाने से रोके जाते हैं।
नासा मार्ग नेजल, प्रीमैक्सिला व मैक्सिला एवं एथेमॉएड अस्थियों का बना होता है। > नासा गुहा आन्तरिक नासा द्वारों द्वारा नासा यसनी (Nasopharyx) में खुलती हैं।

मुख (Mouth):- मुख श्वसन तंत्र में एक द्वितीयक अंग के तोर पर कार्य करता है। नासिका से ली गयी साँस मुख की तुलना में अधिक शुद्ध होती है।

3.ग्रसनी (Pharynx):- ग्रसनी एक पेशीय संरचना है। इसके तीन भाग है- (a) नासा प्रसनी (b) मुख ग्रसनी (c) कंठ ग्रसनी
> ग्रसनी पाचन तंत्र एवं श्वसन तंत्र का एक Comman Path है > कंठ ग्रसनी के नीचे 2 द्वार होते है-

(1) घाटी द्वार (Glottis) जो आगे श्वांस नली में खुलता है।
(2) निगल द्वार (Gullet) जो भोजन नली में खुलता है।
Glottis के उपर एक ढक्कन नुमा सरंचना घाटी ढक्कन (एपीग्लोटिस) पाया जाता है, जो भोजन को श्वांस नली में जाने से रोकता है।

4. स्वर यंत्र (Layrnx):- कंठ ग्रसनी एवं श्वांस नली को जोड़ने वाली संरचना कंठ (लैरिंक्स) में 6 प्रकार की 9 उपस्थियाँ पाई जाती है कंठ में स्वर रज्जू (Vocal Cords) भी होते है जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
कंठ का उभरा हुआ भाग एडम्स एप्पल (कंठमणि) कहलाता है। यह पुरुषो में अधिक बाहर निकला होता है जिसके कारण पुरुषों की आवाज अधिक भारी होती है।
पक्षियों में ध्वनि उत्पन्न करने के लिए सिरिंक्स पाई जाती है।

5. श्वांस नली एवं श्वसनिका (Trachea & Bronchus):- यह 12cm लम्बी नली है जो कंठ से वक्ष गुहा तक फेली रहती है वक्ष गुहा में दो भागो में बंट जाती है जिसे दायीं एवं बायीं श्वसनी (प्राथमिक श्वसनी) कहते है। > श्वांस नली, प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक श्वसनी में C आकृति के उपास्थिल छल्ले पाए जाते है। जो श्वास नली एवं इनको पिचकने से बचाते हैं। > इनकी संख्या 16-20 होती है।
श्वांस नली एवं श्वसनी में पक्ष्माभी उपकला पायी जाती है।
श्वसन मार्ग की भित्ति पर श्लेष्मा कोशिकाए भी पाई जाती है जो श्लेष्मा का स्त्राव करती है > मानव के प्रत्येक फेफेड़े में एक श्वसनी (Bronchus) प्रवेश करती है तथा फेफड़े के अन्दर लगातार उप विभाजित होकर, द्वितीयक एवं तृतीयक श्वसनी (Bronchi), श्वसनिकाएँ (Bronchioles) अन्तस्थ श्वसनिकाएं तथा श्वसन श्वसनिकाएँ (Rrespiratory bronchioles) बनाती हैं। श्वसन श्वसनिकाएँ वायुकूपिका वाहिनी (Aiveolar ducts) में उपविभाजित होती हैं जो वायु कूपिका कोश या एट्रीयम में खुलती हैं। प्रत्येक कोश या एट्रीयम में छोटी वायु कूपिकाओं का एक समूह जुड़ा रहता है। दोनों फेफड़ों में लगभग साठ करोड़ वायु कूपिकाऐं होती हैं। > वायु कुपिका की आंतरिक परत सरल शल्की उपकला की बनी होती है
श्वसन श्वसनिकाएँ, वायु कूपिका वाहिनी, एट्रीयमएवं वायु कूपिकाऐं एक श्वसन इकाई बनाती हैं।
वायु कूपिकाऐं गैसीय विनिमय की प्रमुख सतह हैं।

6. फेंफडे (Lungs) :- मानव की वक्ष गुहा में हृदय के पास गुलाबी रंग के, हल्के एवं लचीले दो फेफड़े स्थित होते हैं।
दायाँ फेफड़ा तीन तथा बायाँ फेफड़ा दो पालियों से निर्मित होता है। फेफड़ों को दो फुफ्फुसावरण (Pleura) घेरे रहते हैं। फुफ्फुसावरणों के मध्य तरल (Pleural fluid) भरा रहता है। फुफ्फुसावरणों के मध्य कोटर (Pleural cavity) में कोई वायु नहीं होती है। यह कोटर फेफड़ों को पिचकने से बचाती है। दोनों फेफड़ों के कोटर पृथक पृथक होते हैं। दुर्घटनावश कोटरों में वायु प्रवेश हो जाती है तो फेफेड़े पिचक जाते हैं।
पर्शुका पिंजर फेफड़ों को घेरे रहता है तथा सुरक्षा प्रदान करता है। गुम्बद के आकार का पेशीय तनुपट वक्ष गुहा को उदर गुहा से पृथक रखता है।
डायफ्राम एवं अंतरापर्शक पेशियाँ श्वसन में सहायता करती है।

श्वसन की क्रियाविधि श्वसन में निम्नलिखित चरण सम्मिलित है।
(i) श्वसन या फुप्फुसी संवातन जिससे वायुमंडलीय वायु अंदर खींची जाती है और CO₂ से भरपूर कूपिका की वायु को बाहर मुक्त किया जाता है।
ii) कूपिका झिल्ली के आर-पार गैसों (O और CO) का विसरण ।
iv) रुधिर और ऊतकों के बीच O और CO का विसरण।
(iii) रुधिर द्वारा गैसों का परिवहन (अभिगमन)
(v) अपचयी क्रियायों के लिए कोशिकाओं द्वारा O का उपयोग और उसके फलस्वरूप C, का उत्पन्न होना
बाह्य श्वसन (External Respiration) वायुमंडल से फेफड़ो की वायु कुपिकाओ तक का मार्ग जिसमे मुख्यत गैसों का आदान प्रदान (विनिमय) किया जाता है। इसमें 2 प्रक्रियां सम्मिलित है (a) अंतः श्वसन (b) उच्छ श्वसन

(2) अन्तःश्वसन (Inspiration)-
वायु (O) का शरीर में प्रवेश करना निश्वसन कहलाता है। इसे इन्हेलेशन (Inhalation) भी कहते हैं।
अंतः श्वसन सक्रिय प्रावस्था है जो तनुपट (Diaphragm) एवं बाह्य अंतरापर्शक पेशियों (Intercostal muscles) के संकुचन से प्रारम्भ होती है। जब तनुपट संकुचित होता है तो वह चपटा हो जाता है। तनुपट संकुचन के समय उदर की ओर नीचे आ जाता है, जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है। इसके साथ बाह्यअंतरापर्शक पेशियाँ भी संकुचित होती हैं। इनके संकुचन से पसलियाँ बाहर एवं ऊपर की ओर खींची जाती हैं। दोनों क्रियाओं के फलस्वरूप वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है। इसके कारण वक्ष गुहा एवं फेफड़ों में वायु का दाब वायुमण्डल के दाब से कम हो जाता है। वायु दाब में इस अन्तर के कारण वायुमण्डल से वायु श्वसन मार्ग से होती हुई वायु कूपिकाओं में तेजी से तब तक भरती रहती है, जब तक कि कृपिकाओं का दाब वायुमण्डल के दाब के बराबर न हो जाये।

(b) उच्छवसन (Expiration)– फेफड़ों से वायु (CO:) का शरीर से बाहर निकालना उच्छवसन कहलाता है। इसे एक्हेलेशन (Exhalation) भी कहते हैं।
विश्राम अवस्था में यह निष्क्रिय प्रावस्था है। निःश्वसन के पश्चात् उच्छवसन होता है। जब बाह्य अंतरापर्शक पेशियों एवं तनुपट की पेशियाँ शिचिलित होती है, तब पसलियाँ स्वयं के भार के कारण नीचे आ जाती हैं तथा तनुपट वक्ष गुहा में ऊपर उठ जाता है। इस कारण वक्ष गुहा का आयतन कम होने से इसका वायुदाब वायुमण्डलीय दाब से अधिक हो जाता है। फेफड़े संपीड़ित हो जाते हैं एवं उनमें भी दाब बढ़ जाता है। वायु कृषिकाओं से वायु श्वसन मार्ग से होकर बाहर वायुमण्डल में चली जाती है।

व्यायाम एवं शारीरिक श्रम के समय उच्छवसन सक्रिय अवस्था हो जाती है। आंतरिक अंतरापर्शक पेशियों (Internal intercostal muscles) तेजी से संकुचित होती हैं तथा पसलियों को नीचे की ओर खींचती हैं, जिससे वक्षीय आयतन कम हो जाता है। उदरीय पेशियाँ भी तेजी से संकुचित होती हैं जो उदर गुहा पर दबाव बढ़ाती हैं। इस दाब के कारण तनुपट वक्ष गुहा में ऊपर की ओर अधिक सक्रिय रूप से गति करता है। इन दोनों पेशियों के संकुचन से फेफड़े तेजी से संपीड़ित होते हैं। तथा वायु बलपूर्वक बाहर निकाली जाती है।
मानव में विश्राम अवस्था में वयस्क की श्वसन दर (संवातन) 12-18 प्रति मिनिट होती है। (सोते समय कम हो जाती है)

नवजात शिशु की सामान्य सांस लेने की दर लगभग 40 से 60 (44) बार प्रति मिनट होती है। > रेस्पाइरोमीटर एक ऐसा यंत्र है जो श्वसन की दर, श्वसनीय गुणांक एवं श्वसन की वायु का आयतन का मापने हेतु उपयोग किया जाता है। सामान्यतः मनुष्य में एक बार साँस लेने की क्रिया में 5 सेकेंड का समय लगता है। > अंतः श्वसन में 2 सेकेंड एवं उच्छ श्वसन में 3 सेकेंड समय लगता है

श्वसन सम्बंधी आयतन (Volume Related Respiration)

1. ज्वारीय आयतन (Tidal Volume, TV) सामान्य श्वसन के समय एक निःश्वसन में फेफड़ों में भरी गई वायु का आयतन या एक उच्छश्वसन में निकाली जाने वाली वायु का आयतन ज्वारीय आयतन कहलाता है। प्रतिश्वास ज्वारीय निःश्वसन या ज्वारीय उच्छृंसन का माप 500 मिली होता है। स्वस्थ मनुष्य लगभग 6000 से 8000 मिली. वायु प्रति मिनिट की दर से निःश्वसन व उच्छ्वासन कर सकता है।

2. निःश्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume, IRV) वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक निःश्वासित कर सकता हैं। यह औसतन 2500 मिली. से 3000 मिली. होती है।

3. उच्छवसन आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume, ERV)- वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक उच्छवसित कर सकता है। औसतन यह 1000 मिली. से 1100 मिली. होती है।

4. अवशिष्ट आयतन (Residual Volume, RV)– वायु का वह आयतन जो बलपूर्वक उच्छ्वसित के बाद भी फेफड़ों में शेष रह जाता है, उसे अवशिष्ट आयतन कहते हैं। औसतन यह 1100 मिली. से 1200 मिली. होता है।

श्वसन सम्बंधी क्षमताएँ (Capacities related to respiration)

1. निःश्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity, IC):– वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक निःश्वसन में ग्रहण की जा सकती है। इसमें ज्वारीय आयतन तथा निःश्वसन आरक्षित आयतन सम्मिलित हैं। इसका माप 3500 मिली. होता है। (TV+IRV)

2. उच्छवसित क्षमता (Expiratory Capacity, EC) :- वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक उच्छ्वसित में बाहर निकाली जाती है। इसमें ज्वारीय आयतन और उच्छ्वसित आरक्षित आयतन सम्मिलित (TV+ERV) हैं

3. क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (Functional Residual Capacity, FRC) :- सामान्य उच्छवसन के बाद जो वायु की मात्रा फेफड़ों में बचती है। इसमें उच्छवसन आरक्षित आयतन और अवशिष्ट आयतन सम्मिलित होते हैं (ERV+RV)
इसका मान 2300 मिली. होता है।

4. जैव क्षमता (Vital Capacity):- यह फेफड़ों में अधिकतम भरी गयी तथा अधिकतम निकाली गयी वायु होती है। इसका मान VC= [IRV+TV]+ERV के बराबर होता हैं। इसका माप लगभग 4600 मिली. होता है।

5. फेफड़ों की कुल क्षमता (Total Lung Capacity, TLC) :- अधिकतम प्रयास के बाद फेफड़ों में भरी जा सकने वाली अधिकतम वायु की मात्रा को कुल फेफड़ों की क्षमता कहते हैं। इसका मान TLC=VC+RV के बराबर होता है। इसका माप लगभग 5800 मिली. होता है।

गैसों का विनिमय – कुपिकाएं गैसों के विनिमय के लिए प्राथमिक स्थल होती हैं। गैसों का विनिमय रक्त और ऊतकों के बीच भी होता है। इन स्थलों पर O: और CO₂ का विनिमय दाब अथवा सांद्रता

  • प्रवणता के आधार पर सरल विसरण द्वारा होता है। गैसों की घुलनशीलता के साथ-साथ विसरण में सम्मिलित झिल्लियों की मोटाई भी विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कुछ महत्वपूर्ण घटक हैं।
  • रक्त में तथा वायु में प्रत्येक गैस का विसरण दाब आंशिक दाब (partial pressure) कहलाता है। विसरण में गैसें अपने अधिक आंशिक दाब से कम आंशिक दाब की ओर जाती है।

गैसों का परिवहन (Transport of Gases)

  • लगभग 97% 0₂ का परिवहन रक्त में लाल रक्त कणिकाओं (Hb) द्वारा होता है। – शेष 3 प्रतिशत O₂ का प्लाजमा द्वारा घुलित अवस्था में होता हैं।
  • O और CO के परिवहन का माध्यम रक्त होता है।
  • लगभग 20-25 प्रतिशत CO₂ का परिवहन लाल रक्त कणिकाओं (Hb) – जबकि 70 प्रतिशत का बाईकार्बोनेट (सोडियम बाई कार्बोनेट) के रूप में अभिगमित होती है। – लगभग 7% CO₂ प्लाजमा द्वारा घुलित अवस्था में होता हैं।
  • हिमोग्लोबिन को श्वसन वर्णक भी कहते है क्योंकि यह श्वसन की ऑक्सीजन गैस के साथ क्रिया कर रक्त का रंग लात करता है जबकि हिमोग्लोबिन के स्वयं का रंग बेगनी होता है।
  • ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन के साथ उत्क्रमणीय रूप से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है।
  • ऑक्सीजन, हीमोग्लोबिन का ऑक्सीकरण नहीं करती।
  • ऑक्सीहीमोग्लोबिन का बनना ऑक्सीजनीकरण (Oxygenation) की किया है।
  • कुछ गैसे (जैसे ओजोन) हीमोग्लोबिन का ऑक्सीकरण कर देती है। ऑक्सीकृत हीमोग्लोबिन मेचेमोग्लोबिन (Methamoglobin) कहलाता है। इसमें मौजूद आयरन सामान्य फेरस (Fe) अवस्था से फेरिक (Fe) अवस्था में आ जाता है। मेचेमोग्लोबिन ऑक्सीजन को बांधने में असमर्थ होता है।
  • मेचेमोग्लोबिनेमिया को ब्लू बेबी सिंड्रोम (खून में ऑक्सीजन की कमी से शिशु की त्वचा नीली) भी कहा जाता है > मेथेमोग्लोबिनेमिया के कारण पीने के पानी में नाइट्रेट की मात्रा ज़्यादा होना, वंशानुगत होना
  • हिमोग्लोबिन में फेरस (Fe) के चार आयन होते है जो ऑक्सीजन के 4 अणुओं का वहन कर सकते है।
  • एक सामान्य व्यक्ति में हिमोग्लोबिन की मात्रा 14-16 ग्राम प्रति 100ml (डेसी लिटर) रक्त होती है। पुरुषों में हीमोग्लोबिन नॉर्मल रेंज 13-5-17.5 g/dL होता है। जबकि, महिलाओं में यह 12.0-15.5 g/dL, होता है। श्वसन की क्रिया का नियमन तंत्रिका तंत्र के मेड्युला एवं पोंस द्वारा किया जाता है मस्तिष्क के पास क्षेत्र में न्युमोटोक्सिक सेंटर पाए जाते है।
  • कृत्रिम श्वसन के लिए, ऑक्सीजन और हीलियम गैस सिलेंडर के मिश्रण (हेलोक्स) का उपयोग किया जाता है। > बंद कमरे के अंदर अंगीठी में लकड़ी या कोयला जलाने से कमरे में कार्बन मोनोऑक्साइड का लेवल बढ़ जाता है और कमरे में धीरे-धीरे ऑक्सीजन का लेवल घटता चला जाता है।
  • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) एक जहरीली गैस है जो हीमोग्लोबिन से मिलकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। –
  • कार्बन मोनोऑक्साइड के प्रति हीमोग्लोबिन की बंधुता ऑक्सीजन की तुलना में लगभग 300 गुना अधिक होती है > कार्बन मोनोऑक्साइड, हीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन की जगह ले लेती है। इससे हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम हो जाती है जिसके कारण दम घुटने लगता है एवं चक्कर आने लगते है, मौत भी हो सकती है। CO के स्रोत – मोटरवाह‌नों व सिगरेट से निकलने वाले धुएँ, कोयला, ईंधन लकड़ी, पेट्रोल का अपूर्ण दहन हैं। >

आंतरिक या कोशिकीय श्वसन (Internal or Cellular Respiration))

  • यह चरण कोशिका के अंदर सम्पन्न होता है इसलिए इसे कोशिकीय श्वसन भी कहते है
  • इसमें ऑक्सीएवं अनॉक्सी श्वसन के आधार पर निम्न प्रक्रियां देखने को मिलती है- वायुवीय व अवायुवीय श्वसन में प्रारम्भिक चरण समान होते है अर्थात् ग्लूकोज पायरूविक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है। पायरूविक अम्ल का भविष्य O₂ की उपस्थिति व अनुपस्थिति पर निर्भर करता है।
  • ग्लाइकोलाइसिस :- ग्लाइकोलाइसिस शब्द की व्युत्पत्तिः ग्रीक शब्द ग्लाइकोज (Glycose शर्करा) व लाइसिस (lysis विश्लेषण, घुलना, टूटना) से मिलकर हुई है जिसका अर्थ है शर्करा का विघटन। > यह एक जटिल जैव रासायनिक क्रिया है जो 10 क्रमबद्ध चरणों में सम्पन्न होती है।
  • इसके विभिन्न चरणों की खोज 1930 में तीन जर्मन वैज्ञानिकों गुस्ताव एम्बडन (G. Embden), ओटो मेयरहॉफ (Otto Meyerhoff) एवं जे. पारनस (1. Parnas) द्वारा की गई थी। इस अभिक्रिया को EMP पथ भी कहते है।
  • यह कोशिकाद्रव्य में बिना ऑक्सीजन के उपयोग के सम्पन्न होती है अर्थात इस अभिक्रिया के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है।
  • ग्लाइकोलाइसिस सभी जीवों में समान रूप से सम्पन्न होती है तथा ऑक्सी एवं अनॉक्सी दोनों प्रकार के श्वसन में पाई जाती है।
  • ग्लाइकोलाइसिस अभिक्रिया में चार अणु ए टी पी का निर्माण होता है जिसमें से 2 अणु खर्च हो जाते है; अतः लाभ 2 ATP अणुओं का होता है। > इसमें 2 अणु NADH+H बनते हैं। प्रत्येक NADH+H’ से इलेक्ट्रोन परिवहन तंत्र (ETS) द्वारा 3 ATP अर्थात कुल 6 ATP का निर्माण होता है। > इस प्रकार ग्लाइकोलाइसिस से कुल 8 ATP का शुद्ध लाभ होता है।
  • ग्लूकोज (C6) के एक अणु का क्रमबद्ध जैव रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा पाइरुविक अम्ल (C3H4O3) के 2 अणुओं में विघटित होकर ऊर्जा मुक्त करना ग्लाइकोलाइसिस कहलाता है।

(2) योजक अभिक्रिया (Link Reaction) कोशिकाद्रव्य में ग्लाइकोलाइसिस से बनने वाले पाइरुविक अम्ल के माइटोकोन्ड्रिया में प्रवेश करने पर श्वसन का दूसरा चरण आरम्भ होता है। माइटोकान्ड्रिया के आधात्री (Matrix) स्थल में पाइरूविक अम्ल का एक कार्बन परमाणु CO, के रूप में आक्सीकृत हो जाता है। इस प्रक्रिया को आक्सीकारी विकार्बोक्सिलकरण (Oxidative decarboxylation) कहते है। इसके बाद इसका पाइरुविक डिहाइड्रोजिनेज एन्जाइम की उपस्थिति में पहले आक्सीकरण होता है व बाद में कोएन्जाइम ए (Co-A) से संयुक्त होकर ऐसीटिल को एन्जाइम ए (Acetyl CoA) (C₂) का निर्माण होता है।

ऐसीटिल को एन्जाइम ए के निर्माण की अभिक्रिया ग्लाइकोलाइसिस एवं क्रेब्स चक्र को जोड़ने का कार्य करती है अतः इसे योजक अभिक्रिया (Link reaction) या प्रवेश अभिक्रिया (Gateway reaction) भी कहते है। इस प्रकार पाइरूविक अम्ल के दो अणुओं के ऑक्सीकरण से दो अणु ऐसीटिल को एन्जाइम ए एवं 2 अणु NADH के बनाते हैं। इन NADH, के 2 अणु से 6ATP अणुओं का निर्माण होता है।

(3) केब्सचक्र / सिट्रिक अम्ल चक्र / T.C.A. cycle (Tricarboxylic Acid Cycle) 🙂

माइटोकॉन्ड्रिया में होने वाले इस चक्र की खोज ब्रिटिश जैव रसायन शास्त्री सर एच. ए. क्रेब्स ने 1937 में की थी। इन्हीं के सम्मान में इसे केव्स चक्र कहा जाता है। इस कार्य के लिए सर क्रेब्स को 1953 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। क्रेब्स चक्र का प्रथम उत्पाद सिट्रिक अम्ल होता है इसलिए इसे सिट्रिक अम्ल चक्र के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि सिट्रिक अम्ल में अम्लीय ग्रुप-COOH के तीन अणु होते है, इसलिए इस चक्र को त्रिकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Tricarboxylic Acid Cycle) भी कहते हैं। क्रेब्स चक्र के प्रारम्भ में 2 कार्बन युक्त ऐसीटिल को एन्जाइम ए (Acetyl CoA) अपने ऐसीटिल समूह के दोनों कार्बन परमाणु आक्सेलोऐसीटिक अम्ल को स्थानान्तरित कर देता है जिससे 6 कार्बन परमाणु युक्त सिट्रिक अम्ल (C.H.O.) का निर्माण होता है।

श्वसन सम्बन्धित रोग

1. अस्थमा या दमा (Asthma): यह रोग परागकण, धूलकण, खाद्य पदार्थों, धुंआ, ठंड, धूम्रपान आदि से होने वाली एलर्जी के कारण होता है। इस रोग में श्वसनियों में अधिक श्लेष्मा बनना, सूजन आ जाना एवं इनका संकरा हो जाने के कारण श्वास लेने में कठिनाई पैदा होती है।

2. श्वसनीशोथ (Bronchitis): यह रोग धूम्रपान के कारण होता है। सिगरेट के धुएँ में उपस्थित रसायनों के कारण अधिक मात्रा में श्लेष्मा बनने के कारण श्वसनी में सूजन आ जाती है तथा सीलिया नष्ट हो जाते हैं।

3. वात स्फीति (Emphysema):- यह रोग भी अत्यधिक धूम्रपान से होता है। धूम्रपान से फेफड़ों में लगातार उत्तेजना होती रहती है। जिससे कृपिका भित्तियाँ धीरे धीरे नष्ट हो जाती हैं

4. न्यूमोनिया (Pneumonia):- स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी जीवाणु द्वारा फेफेड़ों के संक्रमण से यह रोग होता है। संक्रमण से कूपिकाऐं मृत कोशिकाओं (श्वेताणु) तथा तरल से भर जाती है जिससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है। रोगी को साँस लेने में कठिनाई होती है।

5. फेफेड़ों का कैन्सर (Cancer of Lungs) :- इसका प्रमुख कारण धूम्रपान ही है। सिगरेट के धुएँ में उपस्थित रसायन कैसर जनक होते हैं। धुएँ से श्वसनियों की उपकला में उत्तेजना से अनियंत्रित कोशिका विभाजन प्रारम्भ हो जाता है जिससे धीरे धीरे पूरे फेफड़े में कैन्सर हो जाता है।

• भारत में सबसे ज्यादा पाए जाने वाला केसर फेंफड़ो का कैंसर है

6. सिलिकोसिस एवं एसबेस्टोसिस (Silicosis and Asbestosis): यह रोग वायु प्रदूषण के कारण होता है। ऐसे श्रमिक जो सिलिका एवं एसबेस्टॉस की खानों या कारखानों में कार्य करते हैं, उनमें यह रोग होने की सम्भावना होती है। श्वास के साथ इन पदार्थों के कण फेफड़ों में चले जाते है तथा फेफड़ों के ऊपरी भाग में फाइब्रोसिस (तन्तुमय ऊतक में वृद्धि) तथा सूजन पैदा करते हैं। ये दोनों रोग असाध्य हैं।

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